देहरादून। जब-जब संत महापुरूष संसार में आते हैं तो वे मानव समाज़ को ईश्वर तक ले जाने वाली सटीक दिशा प्रदान किया करते हैं। मानव चाहे गृहस्थ मार्ग से अथवा सन्यास मार्ग से ईश्वर तक पहुंचना चाहे, उसे संतों-महापुरूषों के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ा करती है। महापुरूषों का मार्गदर्शन यथार्थवादी मार्गदर्शन हुआ करता है, न कि पलायनवादी। वे जीवात्मा को सदा सचेत किया करते हैं कि सिर्फ़ संसार में गाफ़िल न रहते हुए अपितु, अपने समस्त दायित्वों का निष्ठापूर्वक और निष्काम पूर्वक निर्वहन करते हुए उस परमपिता परमेश्वर के साथ जुड़े रहना भी आवश्यक है। हीरे जैसा जन्म मानव का बताया गया है, इसे कौड़ी के भाव नहीं गुजार देना है। बल्कि! वह कार्य करते हुए जीना है जिसके लिए परमात्मा ने मनुष्य का यह शरीर प्रदान किया होता है। जीवन के संघर्ष ठीक वैसे ही हैं जैसे एक हीरा पहले कोयले के रूप में गहरे दबाव को सहन किया करता है और अंततः हीरे के रूप में परिणत होकर अनमोल बन जाता है।
यह उपरोक्त उद्गार आज ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’-देहरादून के निरंजनपुर स्थित आश्रम सभागर में ‘दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी अनीता भारती जी के द्वारा व्यक्त किए गए। अवसर था संस्थान द्वारा आयोजित साप्ताहिक रविवारीय सत्संग-प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। शुरुआत भावपूर्ण भजनों की श्रंखला के प्रस्तुतीकरण के साथ की गई। मंचासीन संगीतकारों के सुर तथा ताल के दिव्य संगम ने भक्तजनों को भाव-विभोर कर दिया।
भजनों की विस्तृत व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी ने किया। उन्होंने बताया कि जीवन में संतों का संग मिल जाए, ईश्वरीय विचारों का सानिध्य प्राप्त हो जाए, सत्संग की प्राप्ति हो जाए तो समझना चाहिए कि प्रभु की असीम कृपा जीवन में बरसने लगी है। और अगर नकारात्मक सोच रखने वाले लोगों की सोहबत पसंद आने लगे, ईश्वर विमुख लोग जीवन में आने लगें, उनकी निकृष्ट सोच मन को भाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि ईश्वरीय कृपा बिलकुल भी प्राप्त नहीं हो रही है। साध्वी जी ने कहा कि ईश्वर की दया को प्राप्त करना हो तो इस दया को उल्टा कर लेना चाहिए, अर्थात! दया का उल्टा बनता है याद। जिसके हृदय में ईश्वर की याद है तो उसी का जीवन आबाद है। कहा भी गया है- ‘याद है तो आबाद है, भूला है तो बरबाद है।’ ईश्वर के नाम का विस्मरण ही सबसे बड़ी विपत्ति बताई गई है। श्री हनुमान जी से जब पूछा गया कि जीव के जीवन में सबसे बड़ी विपत्ति क्या है, तब वे कहते हैं- ‘कहे हनुमंत बिपत प्रभु सोई, जब लग सुमिरन-भजन न होई।’ ईश्वर के नाम का पल-प्रतिपल सुमिरन तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने भीतर ईश्वरीय परम प्रकाश को ‘परम गुरू’ के द्वारा प्रकट करा लेता है। पूर्ण गुरू अपने पावन ‘ब्रह्मज्ञान’ की सनातन तकनीक से जीव की श्वांसों में परमात्मा का वह शाश्वत आदिनाम प्रकट कर देते हैं जिससे जीव हर आती-जाती श्वांसों में ईश्वर के नाम का सुमिरन करने लगता है। इसी के लिए शास्त्र उद्घोष करता है- ‘आठों प्रहर अराधिये पूरण सतगुरु ज्ञान।’ और पूर्ण गुरु के लिए ही शास्त्र यह भी कहता है- ‘सदगुरू शबद स्वरूप हैं, जाको आदि न अंत।’
साध्वी विदुषी अनीता भारती जी ने अपने उद्बोधन में यह भी कहा कि मन की दिशा ही जीव की दशा का निर्धारण किया करती है, गुरु के ज्ञान के पश्चात ही धीरे-धीरे मन की दिशा ईश्वरीय होने लगती है और उसकी दशा भी सुधरने लगती है। फिर संसार मनुष्य को दुख नहीं देता बल्कि ईश्वर की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होने लगता है। महापुरुषों का कार्य मानव मात्र को पलायनवाद की ओर नहीं बल्कि यथार्थवाद की ओर उन्मुख करना ही रहता है।
प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।
